दोस्तों हम एक ऐसे समाज में जी रहे हैं जिसे पुरुष प्रधान समाज कहते है । जहां ये चलन है कि पुरुष बहुत मजबूत और कभी न पिघलने वाला होता है। वो हर भावुक क्षण में कठोर रुख अपनाता है।
उसके सामने मुश्किल घड़ी यदि खड़ी हो जाती है तो मुमकिन है वो घबराए नहीं लेकिन थोडा सा हिम्मत डोल जाती है। उसकी भी छाती डर से टटोल जाती है लेकिन उसे दिखा नहीं सकता क्योंकि पुरुष कमजोर माना जायेगा यदि उसके आंख से एक भी बूंद छलक गई।
ये समाज उसे कैसे स्वीकार करेगा, यही सोचकर पुरुष वर्ग रोने से कतराता है। जबकि रोने से बहुत ही मन की सफाई होती है, हल्का सा लगने लगता है रोने के बाद।
मैं अपने दोस्तों से इस टॉपिक में जरूर कभी न कभी बात करता हूं और जानने की कोशिश करता हूं कि जब वो अपने निर्धारित चीजे उस वक्त नहीं मुकम्मल कर पाते तो वो क्या करते हैं?
क्या वो उसे भूल कर नए लक्ष्य निर्धारित करने में बैठ जाते हैं या फिर उसे न पाने के गम को महसूस करते हैं और उसे आंखो से छलक जानें की इजाजत देते हैं? तो उनके भी जवाब सुनकर मैं दंग रह जाता हूं। जो सूची हमे पुरुष वर्ग के बारे में बचपन से ही समाज ने थमा दी है इसके विपरीत जवाब मिलते हैं।
वो बोलते हैं कि कई बार हम लड़कियों को भी इस मामले में पीछे छोड़ देते हैं। बहुत ज्यादा रोते हैं, फूट फूट कर रोते हैं, और जब डिप्रेस्ड होते है तब तो हम बाथरूम बंद करके पानी चालू करके चिल्ला चिल्ला कर रोते हैं, जब कोई सामने रोता हुआ देखते है तो अंदर से रोने का मन करता है, गला रौंध सा जाता है और ख़ासकर जब कोई भी मां रोती है।
लेकिन हम संभल जाते है क्योंकि हम अपने आंसू नहीं दिखा सकते न लोगो के बीच, न अपनो के बीच, न दोस्तों के बीच।
लेकिन रोने के बाद सारा मैटर ही खत्म जैसा लगने लगता है, फिर से जीने की उम्मीद सामने खड़ी दिखती है। उतना ही रिलैक्स महसूस होता है रोने के बाद जितना सैक्स करने के बाद रिलैक्स महसूस होता है।
तो रोना कभी भी किसी भी एंगल से पुरुष को कमजोर नहीं इंगित करती बल्कि ये दर्शाती है कि हां ये मानव में होने वाली भावनाओ को महसूस करता है और काठ जैसा कठोर नहीं है दर्द इसे भी होता है।
इतिहास खंगाल कर देखिए जो हर बात की गवाही देता है।
महान प्रतापी अयोध्या के राजा महाराज श्री राम जब जंगल में थे और उनके भार्या माता सीता का हरण हुआ था तब वो कैसे व्याकुल थे और कैसे रो रहे थे। तो जब ये रोने में नहीं हिचके तो हम क्यूं रोने को लेकर इतना बड़ा पहाड़ उठाए फिर रहे हैं। ये अभी का नव निर्मित समाज ही इसे बनाया है जिसे मानना जरूरी नहीं है
कविता प्रस्तुत है........
रो लेते हैं
जब कुछ पा नहीं पाते
रात में सो नहीं पाते
गिरकर उठ नहीं पाते
कदम उठाकर चल नही पाते
तो रो लेते हैं
इसलिए भी रो लेते हैं
कि मन हल्का हो
सुनहरा दिन कल का हो
पुरुष जाति के आंसू भले भिगाये किसी का कंधा न हो
ये आंखे पी जाती आंसू यदि कसूर न पलकों का हो
भीड़ में अकेले हो लेते हैं
जनाब, ये लड़के भी रो लेते हैं
अच्छे बच्चे रोते नहीं, मर्द रोएगा क्यूं
औरतो पे गया है रो देता है
ये बकवास में खुद को पुरुष खो देता है
इसलिए ये काले चश्मे के पीछे रो लेता है
हां महिलाओं की तुलना में थोड़ा सख्त
बनने की कोशिश करता है
थोड़ा सोचता है, थोड़ा रोकता है
होंट थरथराते हैं, तब जाके पलकों से पानी गिरता है
फिर भी खुद को संभाल लेते हैं
अक्सर पुरुष बंद कमरे में रो लेते हैं
तुम्हें लगता है रोने से पुरुष वीक होता है
मुझे लगता है रोने से पुरुष ठीक होता है


