एक नौकरी पेशा लड़के के लिए दो चीज बहुत मायने रखती है। पहली वक्त पे पगार और दूसरी इतवार। पगार इसलिए कि उस राशन दुकान का पूरा महीने भर का उधार नक्की करना है और इतवार छुट्टी का दिन। छुट्टी इतवार बस की होती है तो उस 24 घंटों को 48 घंटे जितना जीने को मन करता है और यही छुट्टी किसी त्यौहार की हो और उन्हें बिताने के लिए घर जाना हो तो उसका एक्साइटमेंट अलग लेवल का हो जाता है। कैसे होता है शहर से घर का सफ़र ये कविता लिखी है मैंने। और ये कविता लिखी है जिसका शीर्षक बहुत खुबसूरत है
'घर जाने की'
टिकट में छपी तारीख जितनी नज़दीक आती जाती है
बेसब्री और बढ़ती जाती है
घर जाने की
धीरे धीरे कपड़े धोकर स्तरी करके रख दिए जाते हैं
कुछ भूल न जाय उस दिन जल्दबाजी रहती है
घर जाने की
बैग पूरा भरा रहता है लेकिन टिफिन खाली रह जाती हैं
क्योंकि उसमें खुशियां भरी रहती हैं
घर जाने की
ट्रेन का स्टेशन से एक मिनट देरी से छूटना नागंवार है
ऐसा हो, हम हों सवार और ट्रेन पकड़े अपनी रफ़्तार
घर जाने की
खिड़की से बाहर देखने पे पहाड़, नदियां, पेड़ सब छूटते जा रहे हैं
जैसे वो भी जिद्दी दौड़ लगा रहे हमारे साथ
घर जाने की
शहर अपने पहुंच, रास्ते से चाट, समोसे ले जाना है
मीठी चटनी लेकर तीखी चटनी भूल जाना पुरानी आदत हो गई है
घर जाने की
दोस्तों, वो शहर से कमाकर लौटा लड़का, हमेशा के लिए घर का होना चाहता है सोचता है कि अब वापस शहर नही जाना लेकिन फिर भी वापसी की टिकट करके आता है।
वो सभी को यही दिखाना चाहता है कि वो दिखता अच्छा है
नए नए कपड़े ले लेता है, जूते भी अच्छे चमकदार लेके, अच्छी महक वाला बॉडी स्प्रे डालकर जब किसी गली से निकलता है तो लोग कहते हैं फलां भईया का लड़का है पंजाब कमाकर आया है।
अपना सारा ध्यान पैसे जुटाने में लगाकर वो भूल जाता है कि एक धन अच्छा स्वास्थ्य होना भी होता है। पर उसकी ओर ध्यान नहीं देता और वही नए कपड़े उसके शरीर को ऐसे जकड़े हुए रहते हैं जैसे शरीर एक मात्र ढांचा है। थोड़ी हेयर स्टाइल अच्छी रखते हैं। और पैसे की गरमाहट भी होती है उस वक्त जिसके कारण दो चार दोस्त आगे पीछे घूमते हैं और उस शहरी बाबू को लगता है कि मेरी धौंस चलती है सारे आम।
और अपने गिरोह को लेकर उस गली से जरूर निकलता है जिस गली में कई शामें बिताई हैं। जाहिर सी बात है वो गली बहुत महत्त्वपूर्ण होगी जहां से होती हुई कई फ़ोन कॉल शहर तक पैदल दौड़ी चली आती थी। साक्षात उसे देखकर पैर चलते रहते है लेकिन आंखें ठहर जाती हैं, पुरानी शामें पाने की लालसा में।
महंगाई बढ़ाने में इन्ही का योगदान ज्यादा रहता है। सस्ती चीज को भी इनके वेश भूषा को देखकर लोग महंगे में बेंच देते हैं और ये अपने रौब के कारण मोलभाव करना अनुचित समझते हैं।
इन महानुभावों को भले अपने स्वास्थ्य की चिंता हो या न हो लेकिन मां को बरोबर ये चिंता खाए जाती है कि इनको क्या बनाकर खिला दूं जिससे ये अच्छी सेहत पा ले। जो बन पाता है मां वो सब उस छोटे समय अंतराल में बना बनाकर खिलाने की कोशिश करती है। और सोचती है मन ही मन कि बहुत कच्ची उम्र में परदेश भेज दिए हम लोग, उसका नतीजा यही मिल रहा।
अमूमन लोग जब शहर से घर आते हैं तो प्लानिंग करके आते है क्योंकि त्योहारों में सबको छुट्टी मिलती है चाहे नौकरी पेशा वाले हो या फिर पढ़ाई कर रहें दोस्त। त्यौहार बीतता है लोग वापसी होने की तैयारी में लग जाते है। आते भले एक साथ हों लेकिन जाते अलग अलग ही हैं। अब इन दोस्तों में कोई मेल दोस्त होता है तो कोई फीमेल। जो कोई पहले जाता है बाकी बचे हुए दोस्त उन्हें बस स्टॉप तक छोड़ने जाते हैं वहीं का ये वाकिया है जिसे मैंने कविता के रूप में लिखने की और उस शाम को बांधने की कोशिश की है सुनिए
दिन छटा रात अड़ी हुई है
क्या वही है महबूबा मेरी जो सामने खड़ी हुई है
जाओ कोई बता दो आशिक यही है तुम्हारा
हो रही सांझ छुप जाए न कहीं आशिक बेचारा
दिन छटा रात अड़ी हुई है
दिल की बातें अभी दिल में पड़ी हुई है
बस को तेरे घर ले आऊं रुक जा कल साथ चलें
आजा मैं तुझको बसा लूं पलको तले
ये रात जल्दी होगी न पूरी बात दिल की रह जायेगी वर्ना अधूरी
ढल रहा ये सूरज पंक्षी वापस आ गए
निकले आंसू जो आंखों में ही समां गए
रुक जा न ए सूरज तनिक सा ठहर जा
आ जा न वापस ऐसे छोड़ के न जा
दिन छटा रात अड़ी हुई है
कुछ तो है जो बस छोड़ वो खड़ी हुई है
सांझ भी जैसे रुक गई है
क्या ये सच है तू भी रुक गई है
सूरज की लालिमा छा गई है
या धुंधला है मंज़र सांसे भी रुक गई हैं
अब दिखता न कुछ धुंवा के सिवा
कोई न था अब यहां मेरे सिवा
दिन छटा रात अड़ी हुई है
रो रो के आंख सूझी पड़ी हुई है
अब इसके बाद इसका दिन भी नहीं कटने लगा। लेकिन रुकना तो था ही क्योंकि वापसी जाने की जो डेट टिकट में है उसे आने में कुछ वक्त बाकी है

