लंका की ये एक अनोखी रात थी। जहां ये समझ नहीं आता कि दिन गया भी था या रात आईं थी सिर्फ लंका में अपने पहर में दिन को देखने। क्योंकि पूरी लंका में रात में उजाला था कोई सो नहीं रहा था। एक तरफ़ रावण, एक तरफ़ राम, एक तरफ़ मंदोदरी, एक तरफ़ सीता सब जाग रहे, आने वाली सुबह के इंतज़ार में। वाकई वो रात किसी की भी काटी नहीं कटी होगी। कोई ख़ुशी से सुबह का इंतज़ार कर रहा था तो कोई भय से।
कल्पना करता हूं कि रावण के मन में क्या–क्या चल रहा होगा उस रात। वो कितनी बार सोचा होगा कि क्या मैं राम की शरण में चला जाऊं? चूंकि पूरी लंका के धुरंधर लोग मारे जा चुके थे। लेकिन अब नहीं जा सकता क्योंकि अब उन सबका बदला लेना है। अब तक रावण को शंका हो रही होगी कि क्या वाकई में ये स्वयं विष्णु भगवान हैं, यदि हां, तब भी वो खुश होता होगा अपनी भुजाओं पर कि उसे मारने स्वयं विष्णु भगवान को धरती में आना पड़ा। वो कभी बैठता होगा, कभी चलता होगा, कभी गुस्से से हाथ रगड़ता होगा। कभी कुंभकरण को याद करता होगा तो कभी विभीषण को, कभी बहन शूर्पणखा को तो कभी पुत्र इंद्रजीत को। वो जब अपने साम्राज्य को देखता होगा अपने महल से, जहां पे मातम छाया है। हर घर में दिया जल रहा। तब ख़ुद पे भी क्रोधित होता होगा और सीता हरण के लिए भी शर्मिंदगी महसूस करता होगा। क्योंकि ये रात आखिरी थी रावण की तरफ़ से और अपना मूल्यांकन करने की भी। रावण को अपना अतीत याद आता होगा और अपना शौर्य और अपनी नीचता भी। क्योंकि ये रात बेपर्द कर देने वाली थी और ऐसी रात में हर कोई निष्पक्ष होकर बैठ जाता है। उसके अच्छे–बुरे कर्म आंखों के सामने से गुजर रहे होते हैं।
"जीतने वाले को नहीं पता होता कि कब जीत जाऊंगा
हारने वाले को पता चल जाता है कि कब हार जाऊंगा "
रावण वो हर रणनीति सोच रहा होगा जिसे अपनाकर त्रिलोक विजेता बना था, जिसे अपनाकर कल के युद्ध को जीता जा सके। लेकिन वो ख़ुद को खाली पाता होगा, तब भी उसे ये ज़रूर पता था कि मैं अमर हूं क्योंकि राम को पता ही नहीं होगा कि मुझे जब तक नाभि में नहीं मारेंगे तब तक मरूंगा ही नहीं। लेकिन तभी भाई विभीषण की याद आती होगी कि ये बात विभीषण जरूर राम को बता दिया होगा। रावण को अपने दसों सिरों से भरोसा उठता नज़र आया होगा। अपने कक्ष में रावण चलते–चलते अचानक अपने चलने की गति तेज़ करता रहा होगा, भोलेनाथ को याद करता होगा उनसे कुछ मांगने की सोचता होगा, लेकिन नहीं जाता होगा कैलाश पर्वत, उसका घमंड नहीं जाने की इजाजत देता होगा।
श्री राम अपने शिविर में जग रहे होंगे। वो भी सोच रहे होंगे कि क्या कल ये युद्ध का परिणाम हो जाएगा। मेरी भार्या मेरे पास होगी। उनको भी अयोध्या आने की उत्सुकता और व्याकुलता रही होगी। क्योंकि चौदह वर्ष वनवास खत्म होने को ही था और भाई भरत की प्रतिज्ञा भी, उन्हें कल युद्ध ख़त्म करने के लिए बाध्य कर रही होगी। भरत ने प्रतिज्ञा ली थी कि यदि चौदह वर्ष के बाद एक भी दिन अधिक भइया राम वनवास में रहे तो वो प्राण त्याग देंगे। श्री राम भी व्याकुल थे कि क्या कल रावण को हरा पाऊंगा। क्योंकि तब तक राम को भी नहीं पता था कि रावण को उसकी नाभि में वार करने पे ही उसे मारा जा सकता था, वो तो विभीषण ने भेद बताया।महल के एक कमरे में बेचारी मंदोदरी है। जिसको अपने पति रावण की हार का पूरा भरोसा था। क्योंकि लगातार इतने बड़े–बड़े लंका के योद्धा मारे जा चुके थे। वो जरूर रावण के कक्ष की ओर जाना चाहती होंगी कि जाऊं और महाराज को बोलूं अभी भी समय है सीता को ससम्मान श्रीराम को दे आओ, लेकिन नहीं गई होगी क्योंकि वो ऐसा कई बार कह चुकी थीं। वो चाहती रही होंगी कि ये रात कभी न खत्म हो ताकि लंका बची रहे। अपनी नन्द शूर्पणखा को भी कोश रही होगी कि इसी के कारण पूरी लंका का सर्वनाश हो गया। कल उसे ये वेशभूषा बदलनी पड़ेगी। बेबस होगी।







