साल के कुछ एक महीने में पूरे भारत में एक विशेष प्रकार की रौनक देखने को मिलती हैं उन्हीं कुछ एक महीने में अक्टूबर - नवंबर आते हैं जिसमें एक के बाद एक त्योहार नत्थी रहते हैं। वैसे तो भारत विविधताओं से संपन्न देश है तो हर दिन कुछ न कुछ त्यौहार बना ही रहता है। और इन्हीं त्योहारों के चलते कर्मचारियों सहित बच्चों को भी छुट्टी मिलती है जिसका आनंद उच्च श्रेणी का होता है।
बहरहाल, नवरात्रि महोत्सव के बाद विजयदशमी, जिसे दशहरा भी कहते हैं आती है।
जिसको मनाने के पीछे कई दंत कथाएं प्रचलित हैं और कई प्रमाणिक साक्ष्य भी अपने को अस्तित्व विहीन नहीं होने देते।
दोस्तों, ये दशहरा का त्योहार पूर्णतय अधर्म पर धर्म की जय, बुराई पर अच्छाई की जीत, सुरों की असुरों पर विजय, सत्य की असत्य पर विजय आधारित है। इसको नवरात्रि के बाद ही क्यों मनाए जानें की प्रथा है, इसको इस लेख में समझने की कोशिश करेंगे साथ ही जानेंगे इस दिन नीलकंठ पक्षी का दर्शन इतना महत्वपूर्ण क्यों माना जाता है और इस दिन पान खिलाकर गले क्यों भेटते हैं और रावण का पुतला क्यों जलाते हैं?
दशहरा क्यों मनाया जाता है??
दोस्तों, दशहरा मनाने से पहले इसके पीछे का रोचक इतिहास जानना बहुत ही जरूरी है। हमारे तुम्हारे बुजुर्गों ने इसे मनाए जानें के पीछे की कहानी बताई। उन्होंने कहा इसी दिन भगवान मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम जी ने उस लंकापति दुराचारी रावण का वध किया था। वो रावण बुराई की जीती जागती एक मिशाल थी और भगवान राम अच्छाई की मूरत। इसी कारण दशहरा को सभी हिंदू धर्म के लोग मानते हैं।
नवरात्रि के बाद क्यों दशहरा मनाया जाता है??
नौ दिन हिंदू धर्म की देवियों के होते हैं । इन दिनों बहुत से हिन्दू लोग व्रत/देवी उपासना रखते हैं। देवी के 9 रूपों का बखान शास्त्रों में इन श्लोकों द्वारा किया गया है
प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति. चतुर्थकम्।।
पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
सप्तमं कालरात्रीति.महागौरीति चाष्टमम्।।
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा: प्रकीर्तिता:।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना:।।
पहले दिन मां शैलपुत्री, दूसरा दिन मां ब्रह्मचारिणी, तीसरे दिन मां चंद्रघंटा, चौथा दिन मां कुष्मांडा, पांचवे दिन मां स्कंदमाता, छठे दिन मां कात्यायनी, सातवे दिन मां कालरात्रि, आठवें दिन मां महागौरी और नौवां दिन मां सिद्धिदात्री का होता है।
कहा जाता है कि इसी दसवें दिन ही मां दुर्गे ने महिषासुर का वध की थी जिसके कारण इसे विजयदशमी के नाम से भी जाना जाता है।
नीलकंठ पक्षी का दर्शन इस दिन शुभ क्यों माना जाता है??
इस दिन हम शाम के वक्त अपने दोस्तों के साठ गांव के बाहर पेड़ों के नीचे जा जाकर देखते थे कि कहीं नीलकंठ के दर्शन हो जाय और जिसको हो जायेगा वही गाएगा "नीलकंठ के दर्शन पावा, घर बैईठे गंगा नहावा" शायद आपने भी बचपन में ऐसा किया होगा बिना कारण जानें, तो आज जानते हैं, फिर से बुजुर्ग को लाते हैं क्योंकि बुजुर्ग हमारे हो या आपके सीख सभी के लिए होती है। वो बताते हैं कि भगवान राम जब उस आतातायी रावण का वध करने जा रहे थे तो रास्ते में एक पक्षी बनकर भगवान शिव स्वयं आए थे, तब श्रीराम ने उनको भाई लक्ष्मण सहित शीश नवाए और रावण पर विजय पाई और भगवान शिव को नीलकंठ भी कहा जाता है क्योंकि उनके गले में विष होने के कारण उनका गला का रंग नीला है। इसलिए दशहरा के दिन नीलकंठ पक्षी का दर्शन मात्र से ऐसी मानता है कि जल्दी ही शुभ समाचार मिलेंगे।
लेकिन इस दिन पता नही कमबख्त ये पक्षी कहां गुम हो जाता है दिखता ही नहीं।
पान खिलाकर गले क्यों मिलते हैं?
जैसे ही शाम ढलती हम लोग गांव बाहर से नीलकंठ के बिना दर्शन के ही लौट आते और तैयार होकर गांव के सभी सम्मानित लोगों, बुजुर्गों, अपने से बड़े लोगों के पैर छूकर आशीर्वाद प्राप्त करते थे वहीं वो लोग सभी को मीठी सुपारी और जिसको पान खाना होता था उसको पान भी खिलाते और कुछ टाइम तक उन्हीं लोगो के पास बैठ जाते थे जिससे थोड़ी नजदीकियां बढ़ जाती थीं और जो लोग अपने उम्र के लोगो से मिलते थे वो लोग पान खाकर गले मिल कर आपसी जो भी मतभेद हुए होंगे उसे भुलाकर फिर से नए सिरे से जीना शुरू कर देते थे।
रावण का पुतला क्यों जलाते हैं?
आज का जो चलन है जो भी व्यक्ति विशेष जो एक सरकारी पद में है या जिसके ऊपर किसी भी प्रकार की जनता की जिम्मेदारी है और वो जिम्मेदारी नहीं निभा पाता तो लोग अपना आक्रोश उस व्यक्ति का पुतला जलाकर व्यक्त करते हैं। ठीक इसी प्रकार दशहरा को रामलीला का आयोजन किया जाता है और सार्वजनिक तौर पर राम का किरदार निभाने वाला व्यक्ति रावण के उस विशालकाय शरीर को तीर से भेदता है और उस रावण का दहन करते हैं ताकि ऐसा दुर्दांत और बुरा और कपटी कभी न दुबारा हो।
लेकिन रावण को जलाना इतना आसान नहीं है उसके लिए स्वयं त्रिलोकी भगवान श्री राम को उतरना पड़ता है क्योंकि रावण कोई साधारण व्यक्ति नहीं था वो असाधारण पंडित था जिसके ज्ञान के आगे भगवान राम का भी ज्ञान कमतर था जो लक्ष्मण को रणनीति सिखाई, रावण के भी अनुयायी अभी भी हैं जो इसे पूजते हैं और भी रावण के पराक्रम नीचे इस कविता में सारगर्भित हैं
मैं महादेव परमभक्त दिग्विजय असुरराज लंकापति रावण
किसको जलाते हो हर वर्ष 'मैं', 'बुराई' या 'रावण'
यदि 'रावण' को
तो कहां है दशरथ नंदन श्रीराम, स्पर्श करना है उनके चरण
यदि 'मैं' को
तो क्यों होड़ लगी रहती है नीचा दिखाने की हर क्षण
और यदि 'बुराई' को
तो हर साल होता तो है ये दहन
अगले दिन ब्रेकिंग न्यूज़ क्यों होती है, नाबालिग कन्या का हुआ शोषण
क्यों का जवाब पूछता है स्वतंत्र भारत का कण कण
मैं विश्रवापुत्र महापंडित त्रिकाल विजेता दशानन लंका नरेश रावण
रावण की गलतियों से सीखने लायक तथ्य
जिसको जलाने के लिए अपने बाण में आग सुलगा रहे हो उसको थोडा जान लेते हैं।
रावण रंक से राजा बना था। श्रीलंका में श्री लगा है मतलब लक्ष्मी, और लक्ष्मी धन, दौलत पर आधिपत्य कुबेर का होता है। पहले श्रीलंका कुबेर की थी उसके दरवाजे पे रावण बहन शूर्पणखा के लिए दो रोटी मांगने गया लेकिन कुबेर ने उसको लज्जित करके दरबानों से बाहर करवा दिया। फिर वो विश्रवा पुत्र अपने जप तप से ऐसी शक्ति और पांडित्य का स्वामी बन गया की कुबेर को नौकर बना लिया लंका पति बन गया।
रावण जैसा भाई हर बहन चाहती है लेकिन शूर्पणखा जैसी बहन कोई भाई नहीं चाहता।
रावण का सबसे बड़ा घमंड यही था कि वो मानव को तुच्छ समझा और हर ब्रह्माण्ड की शक्ति से अपने जीवन की रक्षा कर ली और अपने को अजेय बना लिया लेकिन उसका यही घमंड एक वनवासी राम मानव रूप में उसका अंत कर दिए
रावण की सबसे बड़ी गलती ये थी कि उसने अपने मृत्यु का कारण अपने भाई से बता दिया। जो उसकी मृत्यु का कारण बना। अपने जीवन को खुली किताब करने से पहले ये सुनिश्चित करना बेहद जरूरी है कि उसमें लिखे किसी भी पन्ने में आपके मृत्यु पर आंच लाए जैसी महत्वपूर्ण राज न लिखे हों उसे सहेज कर अपने पास ऐसे रखे जैसे खुद के लिए भी वो एकमात्र राज हों।
सभी पान खाए और दीवारों को न रंगे
आपसी प्रेम सौहार्द का त्यौहार है, सभी को दशहरा की बधाई








Very good
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