मयंक जो कि तन्हाई पसंद इंसान है। ऐसा नहीं है कि वो बचपन से ही तन्हा रहा। हंसते हुए बच्चे को भी गम होता है ये पंक्ति से दूर है।
ये तन्हाई परोसी गई है जिसमे रहने में मयंक काफी अच्छा महसूस करता है। और उस शक्स को दिल से धन्यवाद देता है, जिसने अपनी खुशी के खातिर इसको तन्हा बना दिया। अब ये अपने में रहता है अपनी बनाई खुद की दुनिया में। और अपनी बनाई उस चमचमाती दुनिया में घुसने के लिए वो बाहर की चमक को बंद कर देता है और एकांत की तलास में छत चला जाता है।
पता नहीं वो अपनी दुनिया में जाने से इंकार आज शाम कैसे कर दिया। वो रोज़ की तरह लाइट बुझा दिया छत की और बैठा तो उसकी नज़र सामने के घर में चमकती हुई लटकती हुई छत से झालर पर अटक गई। दिवाली खत्म हो गई थी, ये झालर छोटी दिवाली की इन्तजार में जल रही हैं।
कुछ झालर के बल्ब खराब हो गए थे जिसके कारण उसकी जगह अंधेरे ने ले ली। थोड़ी हवा चल रही है तो पुरी लड़े झूम रही है। शायद वो भी हवा के मजे ले रही है उन बुझे बल्बों को भुलाकर। ऐसा नहीं है कि उनका भार अभी भी उठाए नहीं हैं लेकिन यदि वो झूमे नहीं तो अगली दिवाली तक वो लाइट देने वाली अंधेरे में किसी बक्से में बंद रहेंगी।
मयंक इनकी चमक में थोड़ा सा खोने सा लगा वो चाह रहा है कि उनको अपनी हथेलियों से झुलाते हुए महसूस करे उनकी तारों को जिसने उसे बांध रखा है और बिना किसी भेदभाव के बरोबर सबको करेंट देती है। उन बल्बों को छूना चाहता है जो पूरी क्षमता के अनुसार प्रकाशित हो रहे।
लेकिन कैसे जाता यदि जाता तो दीवार ठीक वैसे ही डर जाती जैसे कोई भौंरा किसी फूल में मंडरा मंडरा कर खुद को चरम सुख दे रहा हो और कोई इंसान उसे हिला दे और भौंरा डर के भाग जाए।
इन दीप मालाओं (झालरों) का सफर अक्टूबर को विदा करके नवंबर हमें सौगात में दे देने तक का होता है।
दिवाली में इन लड़ियों के सामने बच्चे झूमे होंगे पटाखों का कोलाहल हुआ होगा लेकिन आज कैसे अकेले मालूम पड़ती हैं । मयंक के जैसे ही आपको भी लग रहा होगा कि कोई मशहूर गज़ल कार की लिखी मशहूर गज़ल पढ़ रहे हो और लगे भी क्यों न जो मयंक को इतना मोहित कर गईं जिसे अपनी दुनिया में जाने से रोककर अपने पास बैठा ली।
मयंक बेसुद सा देख रहा है जैसे उनकी आवाज सुन कर समझने की कोशिश कर रहा है तभी एक अचानक से पटाखे जैसा फटने की तेज आवाज हुई मयंक चौंक गया और अक्रोशित हो गया जैसे वो समाधी में लीन रहा हो और उसकी तपस्या कोई भंग कर दी हो लेकिन पता चला कि किसी कार का चक्का ब्लास्ट हुआ है। घड़ी की सुई अपने कदम एक एक करके बढ़ा रही थी कैलेंडर में आज गुजरा हुआ कल होने वाला है। मयंक अब जाकर सोना चाहता है लेकिन मोह तो झालरो से लग गया है

