गुजरात के पोरबंदर में एक गांधी परिवार में या साधारण भाषा में कहें तो करमचंद गांधी के घर में 02 अक्टूबर, 1869 की तारीख में एक नवजात शिशु की किलकारी गूंजी जिसका नाम मोहनदास रखा गया। चूंकि गुजरातियों में ये परम्परा है कि लड़के के पीछे उसके पिता का नाम नत्थी किया जाता है इसलिए इनका नाम मोहनदास करमचंद गांधी हो गया। उस समय बैरिस्टर बाबू का एक चलन था तो उसी सिलसिले में वो यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ लंदन गए और वहां से बैरिस्टर बाबू बनकर अपने देश आए। देश में अंग्रेजी हुकूमत का बोल बाला था और उनको विदेश में भी अपमानित होना पड़ा जिसके कारण उन्होंने अपने देश से अंग्रेजी हुकूमत को जड़
से उखाड़ फेंकने का संकल्प लिया और यही संकल्प उन्हें बैरिस्टर से महात्मा गांधी बना दिया।
बच्चों से बहुत ही नजदीकियां थी जिसके कारण बच्चे उन्हें दुलार पूर्वक बापू कहने लगे। बापू की ब्याह कस्तूरबा नामक लड़की से संपन्न हुआ। बापू को मारधार जैसी क्रियाविधि से डर लगता था इसलिए नहीं कि वो
कमजोर थे बल्कि इसलिए क्योंकि वो मानते थे कि जो काम बिना मार धार के अहिंसापूर्वक हो सकता है तो क्यूं हिंसा करें क्योंकि हिंसा से दोनो पक्षों के लोगों की जानें जाती हैं। इसलिए वो नरमदल के नेता थे।
उनके बारे में एक कथा प्रचलित है कि आखिर वो एक धोती और साफी (गमझा) ही क्यों पहने हुए दिखते हैं
एक बार वो एक तालाब के किनारे से गुजर रहे थे तो देखे एक औरत अपने कपड़े धोकर सूखने को डाल दी थी और अपना शरीर को जंगली पत्तों से ढक रखी थी। कारण पूछने पर बोली की एक ही कपड़ा है मेरे पास और जब ये सूख जाएगी तब इसे पहन लूंगी तो महात्मा गांधी को बड़ा दुःख हुआ कि इनके पास एक ही कपड़ा है और मेरे पास दो दो तो उन्होंने एक कपड़ा उसको दे दिए और प्रण कर लिए कि जब तक देश को आजादी नही दिला दूंगा मैं एक ही कपड़ा पहनूंगा।
खैर, गांधी जी को फोटो में नोटो में देखते हैं वो इसलिए देखते हैं क्योंकि उन्हीं की वजह से आज़ादी संभव हुई है। वो लोगो को चरखा चलाकर व्यवसाय करना सिखाए तो गीता का उपदेश भी दिए।
आजादी मिली लेकिन नाथूराम गोडसे जैसे नपुंसक को ये नहीं भाया कि वो आजाद भारत में आजादी से आजाद हवा को महसूस कर सके, उसने 30 जनवरी,1948 की सुबह उनकी हत्या कर दी। इतिहास भले नाथूराम को काले अक्षरों में लिखे लेकिन वर्तमान में इसे भी उतना मानने लगें हैं लोग जितना गांधी जी को। सियासी लोग अपनी सियासी रोटी सेंकने के लिए किसी भी हद तक जानें को आतुर हैं।
मुझे इस वर्तमान को देखकर ये डर सता रहा कि कहीं ऐसा न हो जाय कि गांधी को जानने के लिए बच्चे कहें कि अच्छा वही गांधी की बात कर रहे हो क्या जिसको नाथूराम गोडसे जी ने मारा था।
महात्मा गांधी जी की स्मृति में उनके जन्म दिन को 02 अक्टूबर, गांधी जयंती के रूप में मनाने लगे। इस दिन स्कूलों में, सरकारी संस्थाओं में कुछ कुछ कार्यक्रम आयोजित किया जाते हैं, प्रतियोगिता आयोजित की जाती है और साथ में इसी दिन स्वच्छता अभियान चलाया जाता है। महात्मा गांधी पर ये निबंध, महात्मा गांधी भाषण के रूप में नीचे एक कविता प्रस्तुत है जिसे गांधी जयंती समारोह में प्रस्तुत किया जा सकता है।
चल दिया जो घर से निकल
डर से हो गया वो बेखबर
बनना है तो बापू बनो, अपनाकर बापू की डगर
आसमान, धरती और है उसके संग ये सागर
रुकना नहीं, हर हाल में तू चल, चल तू मगर
तलाश न कर चप्पल की, बना पैरों के छालों की चप्पल
बने न जब तक राम-राम, बापू - बापू, रुके नहीं चलते रहे
भगवान श्रीराम की प्रतिमा दिखती है बापू में
कर्तव्यनिष्ठ, सत्यपरायण थे ये गुण बापू में
आत्मपरीक्षण जब तक न किए, कोई सुझाव किसी को न दिए
बना साबरमती आश्रम, बन वैद्य सबकी सेवा किए
डर था सबके मन में, कारावास में जानें का
संघर्ष और परिवर्तन की लहर पूरे भारत में फैलाई
उठाकर लाठी, लड़े स्वतंत्रता की लड़ाई
स्वतंत्रता से सांस लेना की घड़ी जब आई
उस नपुंसक ने बापू की सांस ली चुराई
एक ही है वही, बापू के सिद्धांत ही सही
स्वच्छ भारत की बात है कही
नश्वर काया छोड़, हो गए वो अमर
विचार आज भी गूंजते उनके हर डगर
बापू है उसी के साथ जो घबराए नहीं
मजबूत वो कैसे होगा जो ठोकर खाये नहीं
बापू के विचार चुनना, मतलब सही रास्ते पे चलना
बापू का यही है कहना, संघर्ष कर महान बनना
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