दिवाली दीपों का त्योहार कम लेकिन अपनों का त्योहार ज्यादा होता है। इस दिन सब कामगार अपने घर लौटकर घर, मोहल्ले को जगमग कर देते हैं और इसी दिन पता चलता है कि एक घर कितने मुसाफ़िरों का घर है।
लेकिन जो देश के सेवादार होते हैं, हमारे देश के फौजी अपने घर में फ़ोन करके बोलते हैं इस बार करवा चौथ में मेरी फोटो को देखकर ये रश्म कर लो मेरी छुट्टी टलकर दिवाली में जा गिरी है।
मैं अभी से अपनी टिकट दिवाली के लिये कर लेता हूँ, उम्मीद है कि छुट्टी अब नहीं टलेगी।
ये उम्मीद करवा चौथ की उस कमी को पूरी तो नहीं करती लेकिन जल्दी मिलने की आशा की लौह को और प्रज्जवलित करती है और ये उम्मीद से ही तो सारे घर को ऐसे सजाया जाता है मानो सारी खुशियाँ घर की सारी दीवारें महसूस कर रही हों।
हर घड़ी बस गांव से जाती वो सड़क में बस को देखती जिससे वो फौजी उतरेगा और दिवाली की ढेर सारी खुशियाँ हमारे आंगन में बरस जायेंगी।
लेकिन IRCTC को नुकसान सहना पड़ता है और दिवाली में अलंकारों से सुसज्जित हाथों में पूजा की थाली लिये उस जलते घी के दिये को एक हाथ से हवा को रोकती हुई उस उम्मीद पे अपनी उम्मीद लगाये खड़ी इंतजार करती होती है।
घर से दूर बैठे मां के लाड़ले हर वक्त यही दिलासा देते हैं कि इस बार अच्छा एग्जाम गया है उम्मीद है इस दिवाली खुशियों वाली होगी, इससे खुश होकर अम्मा फिर से दिवाली में आ जाने के लिए राजी हो जाती है। पूरा साल बीत जाता है घर से दूर लोगों से भरे बीहड़ में रहते, पढ़ते पढ़ते न जानें उम्र कैसे रेत जैसी हाथों से फिसलती हुई नजर आती है सिर्फ इस उम्मीद में कि इस बार तो निराशा लेकर गांव, घर नहीं जाना। खुशी भी रहती है गांव जाने कि इसलिए नहीं कि दिवाली है इसलिए कि चलो अच्छा अच्छा मां के हाथों का खाना मिलेगा , क्योंकि इतने कम बजट में जीभ अपना स्वाद गंवा बैठती है। डर भी थोड़ा रहता है बाबू जी का वो बात तो करते हैं लेकिन एक ताने भरे लहजे में जो फिर वापस आकर उस चार बाई चार के कमरे में बैठकर मेहनत में लग जानें की आग लगा देते हैं। वो भी सही हैं लेकिन यार बाबू जी आप हिम्मत मत हारना क्योंकि आपके इन्ही तानो के कारण ही कुछ करने की आग सुलगती रहती है और आपको ये उम्मीद दिलाते हैं कि हम भले थोड़ा देर कर देंगे लेकिन नाउम्मीद नही होने देंगे। इस दिवाली खुशी होनी चाहिए हमारी वजह से नहीं हमारे रिजल्ट की वजह से।
दो महीने पहले से ही रमेश बाबू जो कि अहमदाबाद में एक नौकरी कर रहे हैं, अपनी टिकट छुपके से कर ली है क्योंकि इतने पहले से अपने मालिक से कैसे छुट्टी की बात करे और इस महीने उसकी परफॉर्मेंस भी ठीक नहीं थी जिससे उसे खारी खोटी सुननी पड़ी और टिकट इतनी जल्दी नहीं करेंगे तो बाद में मिलेगी भी नहीं क्योंकि सभी को तो दिवाली में जाना है अपने घर। रमेश बाबू जब रेलवे स्टेशन पर खड़े थे तो देख रहे थे लोगो का हुजूम जैसे वो लोग कहीं टूरिस्ट बनके घूमने जा रहे एक हफ्ते की छुट्टी लेकर, लेकिन ये लोग घर बनाने के लिए घर छोड़े थे न। अब खुद ही बेघर हो गए और जा भी रहे हैं तो सिर्फ शक्ल दिखाने वो भी जाने के लिए इजाजत लेकर। दिवाली के बाद भाई दूज है फिर छठ पूजा है। सब बहुत ही महत्वपूर्ण है तो सबको जाना भी बनता है। अब तो त्योहार ही है जब सभी को मिलने का मौका देता है।
ये दिवाली कुछ खास होगी
पिछली दिवाली की बची फुलझड़ी, राख होगी
न किसी परदेशी के आने का इंतजार होगा
और न ही घर की सफाई का किसी पे भार होगा
हां, इस बार भले ही छोटा उपहार होगा
लेकिन दुगुनी खुशी से भरा त्योहार होगा
दीवारों में चटक स्याही से पुताई होगी
और खाने को ढेर सारी मिठाई होगी
पूरा घर रोशनी से भरा होगा
जैसे सूर्य हमारे घर उतरा होगा
फूल मालाओं से मां लक्ष्मी का मंदिर सजा होगा
दीपमालाओ से पूरे घर का हर कोना सजा होगा
कहीं पे धूम धड़ाम, कहीं पे चिट चिट की आवाज होगी
गणेश सरस्वती मां लक्ष्मी की पूजा भी आज होगी
इस बार बिना शॉपिंग के भी दिवाली होगी
घर में अपनो के साठ घर वाली दिवाली होगी
पड़ोसियों व रिश्तेदारों के घर नहीं जायेंगे इस सरकमस्टांसेस में
जहां से दिए लायेंगे, उस दुकान का नाम लगाएंगे स्टेटस में
हर कोई मजे करे ये दिवाली के पल
आओ करे प्रमोट लोकल फॉर वोकल
कुछ ऐसे ही बनेगी ये दिवाली खास
क्योंकि इस बार नही आजमाई जायेगी किस्मत, खोलकर ताश
आओ मनाए अपनो वाली दिवाली
सभी को हैप्पी दिवाली

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